तोहफ़ा

ता उम्र कई ख़ूबसूरत तोहफ़े दिए
इस ज़िंदगी ने हर इन्सान को
पर भरी उम्र में एक नायाब तोहफ़ा और भी मिलता है ख़ामोशी का।
ख़ुशक़िस्मत हैं वे जो भीड़ में रहते हैं
और हर शख़्स के साथ का लुत्फ़ उठाते हैं।
पर कुछ ऐसे भी बदक़िस्मत होते हैं
जो भीड़ में भी अकेले होते हैं
और अपनी ख़ामोशी में सुक़ून ढूँढ़ते हैं।
चलो कुछ तो नया करें आज
उन अकेले में पड़े शख़्सों की तलाश करें
कुछ अपनी कहें कुछ उनकी सुनें
किसे ख़बर उनकी ख़ामोशी कुछ कह जाए और हमें उनकी ज़िंदगी के तजुर्बों से एक नायाब तोहफ़ा ही मिल जाए ।

ऋता सिंह
20.October.16

अस्तित्व

पारदर्शी काँच की खिड़की पर

दिखती है मुझे एक थर्राती ओस की बूँद,

बदलती हवा के झोंके उसे कँपाते हैं

नवोदित सूर्य की पहली किरण की

ऊष्मा से वह भयभीत हो रही है

मानो कहती है मुझसे

खोलो द्वार मुझे भीतर आने दो एक बार

मुझे अपने अस्तित्व को तो बचा लेने दो

और फिर कुछ ही पलों में

सूरज की किरणे उस पर पड़ती हैं

लु्प्त कर देती हैं उसे सदा के लिए।

मुझे लगा  अस्तित्व  के लिए तड़प रही थी ओस

क्यों मिटाया कारणों ने उसे

क्या इतनी पराधीन होती है लघुता!!!

पर मैं ग़लत साबित हुई उस दिन

जब फिर मैंने काँच की पारदर्शी खिड़की पर

ओस की बूँदों को फिर से थर्राते देखा

स्पष्ट हो गई बात,

अस्तित्व को बनाए रखने के लिए

जूझना पड़ता है।

ऋता सिंह

25August2016

Wales UK

भूल

“बाहर गरमी है , शिवेन धूल उड़ रही है खेलने मत जाओ कपड़े गंदे हो जाएँगे।” पत्नी ने ऊँचे स्वर में कहा

“माँ मेरे सब दोस्त खेल रहे हैं । उनकी मम्मी तो नहीं मना करतीं । आप मुझे जाने दीजिए न प्लीज़ !! ”
पत्नी ने ज़ोर से पुकार कर कहा, ” मैं दूसरी मम्मियों की बात नहीं जानती तुम नहीं जाओगे। कपड़े गंदे होंगे और घर भी।”

बिचारा शिवेन माँ की बात सुन
चुपचाप घर पर ही अपने खिलौनों से खेलता रहा।

मैं चाहकर भी कुछ न कह सका क्योंकि गृहमंत्री के आदेशों का पालन करना ही घर में शांति बनाए रखने का मूल मंत्र है यह मेरी माँ ने सिखाया था।

खै़र गरमी गई और वर्षा का मौसम आया। अब पत्नी फिर से पुराने राग आलापने लगी। फिर वही –
” शिवेन खेलने मत जाओ , बाहर बारिश हो रही है। भीग जाओगे, बीमार पड़ोगे।”
“माँ बारिश बंद हो गई ,मेरे सारे दोस्त खेल रहे हैं जाने दीजिए न प्लीज़ ! ”
माँ ने बौखलाकर कहा , ” एक बार बोल दिया न, नहीं जाना है खेलने , तो नहीं जाना। बाहर कीचड़ है, गंदगी है। समझा करो।

मैंने चुप्पी साध ली थी क्योंकि मैं कलह नहीं चाहता था। पर भीतर ही भीतर जानता था कि कहीं कुछ ग़लत हो रहा है। बच्चा खेलेगा नहीं तो स्वास्थ्य कैसे बनाएगा। पर न बोलना मेरा स्वभाव था सो चुप रहता था।

कई साल बीत गए। शिवेन कभी मोहल्ले के बच्चों के साथ खुली जगह या मैदान पर खुलकर , आज़ादी से खेल न पाया।

कभी गर्मी-धूल तो कभी वर्षा-कीचड़, कभी सर्दी-ओस न खेलने जाने देने के कारण बनते रहे। हमारा शिवेन एकाकी जीवन बिताना सीख गया।
न उसके दोस्त ही बन सके। न कहीं आने जाने की उसने कभी ज़िद की।

अब उसके दोस्त थे आई पॉड, कम्प्यूटर, टीवी ,प्ले स्टेशन, रोबोट्स।
स्कूल से आकर अपने कमरे में दरवाज़ा बंद करके घंटों अपने इलेक्ट्रनिक दोस्तों के साथ वक्त बिताता।

वह पढ़ाई में अच्छा था इसलिए जब जो माँगता कमाऊ पत्नी ला देती। क्योंकि उसके अनुसार हमारा बेटा अनुशासित था। माँ की बात मान लेता था ,बाहर खेलने नहीं जाता था।
मैं दफ्तर के काम से अक्सर टूर पर रहता था इसलिए पत्नी के निर्णय में हस्तक्षेप नहीं करता था। या यों कहूँ कि यह मेरा डिफ़ेंस मैकेनिज़म था।
आज स्कूल में नौंवी कक्षा का रिपोर्ट डे था। हम दोनों को प्रिंसीपल ने बुलाया था। हम जब उनके कमरे में पहुँचे तो वहाँ कई टीचरें बैठी हुई थीं । काउंसेलर भी थीं।

उन्होंने हमसे जो कुछ कहा हम वह सुनकर दंग रह गए।
उन्होंने बताया कि शिवेन सारा दिन स्कूल के कॉरीडोर में अकेला घूमता है।
उसके साथ किसी की दोस्ती नहीं।
वह सारा दिन कुछ नहीं बोलता और किसी भी सवाल का जवाब भी नहीं देता।
पूछने पर चुपचाप खड़ा रहता है। उसके इस स्वभाव के कारण बाकी बच्चे उसका मज़ाक़ उड़ाते हैं और कई बार वह बिचारा पिटता भी है।
एक नया खेल प्रारंभ किया है बच्चों ने, – लाल बत्ती कहते हैं इस खेल को। विद्यार्थी किसी एक छात्र पर जैकेट डाल देते हैं और बाकी सब उसे मारते हैं। वह चुपचाप मार खाता रहा है। यह तो टीचरों को हाल ही में पता चला।

उन्होंने हमसे कहा कि वे बाकी सभी विद्यार्थियों से इस विषय में पूछताछ कर रहे हैं पर बॉटम लाइन अब यह है कि शिवेन को अब मानसिक त्रास के लिए किसी मानसिक रोग तज्ञ से सलाह करने की ज़रूरत है। उसे काउंसेलिंग की भी ज़रूरत है।

यह सब सुन हम दोनों पति – पत्नी हतप्रभ से रह गए। हमारा बेटा मार खाता रहा पर कभी हमसे न बोल पाया!

वह एकाकी जीवन बिता रहा था और हम न समझ पाए!!

आज हमारा बेटा लैक ऑफ़ सोशल स्किल के कारण होम स्कूलिंग कर रहा है।

काश मैं गृह युद्ध के डर से चुप न रहता तो शायद हमारे बेटे का व्यक्तित्व कुछ और ही होता।

माता – पिता बनना आसान होता है परंतु उन्हें पालने के लिए उनसे जुड़ा रहना कितना ज़रूरी है यह हर माता – पिता को आज समझना ही होगा।
ऋता सिंह
11.30 am

ग़लतफ़हमी

हर वक्त अब न जाने क्यों

पदचापों की प्रतीक्षा रहती है।

आँखें न जाने क्यों

उन अनजान लोगों की बाट जोहती है

जो कल तक मेरे दरवाज़े पर

पैरवी किया करते थे।

आज पत्नी ने कंधे पर हाथ रख

मुझे अहसास दिलाया कि

इंतज़ार न करूँ उनका मैं

जो कल तक यहाँ चक्कर लगाया करते थे,

वे मुझसे नहीं मेरे हस्ताक्षर लेने आते थे।

मेरा हालचाल पूछने  नहीं

मेरे अधिकारों को मापने  आते थे।

सलाम  मुझे नहीं

मेरी कुर्सी को पूजनेवाली आते थे।

प्रशंसा मेरे काम की नहीं

मेरे पद और वर्चस्व की करने आते थे।

रोज़मर्रा मेरे घर को महज़ दफ़्तर समझ

अपनी समस्याओं का हल ढूँढ़ने आते थे।

आज मैं सेवामुक्त हूँ,

कल तक सरकारी अफ़सर था

आज वास्तव में घर पर हूँ

जिसे मैंने आम दरबार बना रखा था।

वे मित्र नहीं सब चापलूस थे

अब मुझे छोड़ ये गिद्ध नज़रवाले

किसी नए शिकारी को पूजने निकले होंगे

मेरा पागल मन अब तक

ग़लतफ़हमियों का  शिकार था।

ऋता सिंह

23.6.2016

क्या छूटा

बचपन में पिताजी के जूते में
पैर डालकर चलना अच्छा लगता था
दादा जी की छड़ी और हैट भी
पहनना भाता था।

बाथरूम में खड़े साबुन हथेलियों में घिसकर झाग में फूँक मारकर बड़े गुब्बारे बनाना प्रिय खेल था।

आईने के सामने खड़े मांस – पेशियों के रेशों को देखना मन को प्रसन्न कर देता था

पता नहीं वह उम्र बढ़ती उम्र के साथ कहाँ छूट गई।

बचपन के वे हॉकी स्टिक और बैट
जो हर दम दरवाज़े के पीछे रखे रहते थे,
कंचे,गुलैल, गुल्ली डंडे,पतंग और डोर
जो खाट के नीचे सजे रहते थे
सब न जाने कहाँ छूट गए।
जिस उम्र को हासिल करने
बचपन को छोड़ा
न जाने वह जवानी भी कहाँ छूट गई।
अब जो मुँह बाए खड़ा है
वह है छूटा वक्त , भागती जिंदगी
भीड़ में खोए रिश्ते और शायद
कुछ पुरानी यादगार ।
सब बायस्कोप की तरह
आँखों को सामने घूमते हैं
बस यहाँ अब कोई ७० एम एम का स्क्रीन नहीं होता।
ऋता सिंह

 

माँ मेरी माँ

साड़ियाँ फट जातीं और खरीदने की बात उठती तो माँ अलमारी खोल कर हैंगर पर टंगी चार पुरानी साड़ियाँ दिखा देतीं।
फटी चप्पलें बदलने को कहती तो हर वक्त जवाब यही मिलता कि मुझे कहाँ जाना होता है भला!
तकिए की जगह साड़ी तह लगाकर सिर के नीचे रख लेती
तक़िए की बात निकलती तो कहती मुझे यही है भाती ।
एक कड़ाही में कई तरकारियाँ बनतीं
हर बार कड़ाही धोती माँजतीं ,
नए और लाने के सुझाव पर यही कहतीं कि एक बार में एक ही तो पकेगी चार की ज़रूरत नहीं ।
फटे तौलिए से तन पोंछ लेती ,
नए ला दूँ तो अलमारी में रखी जाती पूछने पर कहतीं तेरे काम आएँगे मुझे इसी में आराम आता है।
सबके खाने पर खुद खाने बैठती अनजाने में और तरकारी माँग लूँ तो अपना हिस्सा भी दे जाती
खुद सूखे भात नमक से खाती।
सिनेमा देखने का ज़िक्र आता तो कहतीं तू देख आ कहानी सुना जाना।
मुझे पढ़ाने, आगे बढ़ने के हर अवसर पर मैंने उसे त्याग और कटौतियाँ करते देखा।
उसके त्याग और ममता की मिसालें मैं कहाँ तक दूँ भला
शायद संसार की माएँ सब ऐसी ही होतीं हैं।
उसके हर त्याग और दर्द का अहसास तो मैंने माँ बनकर ही जाना।
Rita Singh

हम किस ओर जा रहे हैं !!

[26/11/2015, 2:14 pm] ritanani:

स्पेन की बीस दिन की यात्रा पूरी करने के बाद हम कल 25 नवंबर मुंबई पहुँचे। फ्रैंकफ़र्ट में हमें विमान बदलना पड़ा क्योंकि हम लुफ़्तान्सा से यात्रा कर रहे थे । बोइंग विमान उड़ान भरने जा रही थी ,विमान में बड़ी संख्या में खचाखच भीड़ थी। बड़ी संख्या में लोग मुंबई लौट रहे थे। स्कूल खुलनेवाले थे तो ज्यादा से ज्यादा भीड़ मानो भारतीयों की ही दिखाई दे रही थी। हम मैड्रिड से लौट रहे थे सो हमें भी वहीं से फ्लाइट बदलने की आवश्यकता थी।
स्पेन में घूमते – घूमते थक गए थे। अब मन घर लौटने के के लिए बेताब था। फ्रैंकफ़र्ट में इतने स्वदेशी देखकर दिल खुश हुआ।
मैंने कईयों की ओर मुस्कान भरी नज़रें डाली पर हमें इन रिटर्न मुस्कान न मिली। शायद उन यात्रियों को हम जैसे देशवासियों से मिलने की ललक न थी।
खै़र विमान में तो हम सब बैठ गए और उड़ान भरने की प्रतीक्षा करने लगे।

थके माँदे यात्री पहले सो गए पर जब फ्रेश हो लिए तो सीट बेल्ट खोलकर वॉशरूम की तरफ आने लगे। दुर्भाग्यवश हमारी सीट विमान की आख़री सीटें थीं वॉशरूम के पास। क़फ़ी लोग अब वहाँ इकट् ठे होने लगे और अपनी – अपनी सफल यात्रा का गुणगान करने लगे। कुछ ही देर में बातचीत करनेवालों की संख्या बढ़ गई और जर्मनी, अमेरिका,स्पेन योरोप के अन्य स्थानों की स्तुति होने लगी।

धीरे – धीरे अपने देश की कमियाँ, राजनैतिक दलों की ख़ामियाँ, देश की असुरक्षा आदि बातें चर्चे का विषय बन गई।
अब तो लोग भारत को गालियाँ भी देने लगे। मेरे कान गरम हो रहे थे, दस पंद्रह दिन बाहर सैर करके आनेवाले अपने देश की तुलना करने लगे वह भी उसकी कमियों की!

पाराए देश में पंद्रह दिन भ्रमण कर उसकी सुंदरता इतनी भा गई कि अपने देश में केवल कमियाँ ही दिखी!
पर मैं कुछ कह न सकी सिवाए अपनी आँखों से क्रोध व्यक्त करने के अलावा। अपरिचितों से क्या लड़ाई मोल लेती!
अब उतरने का समय था ,हम मुंबई लैंड कर चुके थे,पर अभी बेल्ट खोलने की इज़ाजत न मिली थी । बातें करनेवाले न केवल बेल्ट खोल चुके थे बल्कि अपनी जगह से उठ खड़े हुए,सामान की पेटियाँ खोल डालीं और अपना सामान भी निकालने लगे।
एक दूसरे का देखादेखी अधिकतर यात्री इसी तरह पेश आ रहे थे।
परसर और एयरहोस्टेस अपनी सीटबेल्ट बाँधे सीट पर बैठे सबको बैठ जाने का अनुरोध कर रहे थे।
पर कौन सुनता हम मुंबई जो पहुँच गए थे। डेमोक्रेटिक कन्ट्री में मनमानी की छूट जो है।
अनाउन्समेंट चल रहा था और लोग भी सरकने लगे थे।
मैं सीट बेल्ट बाँधे सुसंस्कृत ,सुसभ्य आदर्श , सहिष्णुता का पाठ पढ़ानेवाले भारतीयों के बर्ताव को देखकर हैरान हो रही थी कि सभी नियमों को तोड़कर चलनेवाले मेरे देशवासी आज सहिष्णुता और असहिष्णुता पर विवाद कर रहे हैं !!
विदेशी वह भी योरोपीय देश के विमान में अन्य विदेशियों के सामने स्वदेश की धज्जी उड़ाकर क्या साबित करना चाहते हैं कि हम अभी भी गोरी चमड़ी ,गोरे देश के कायल हैं ?

इससे बड़ा अपमान और क्या हो सकता है कि हम विदेशियों के सामने अपने देश को छोटा साबित करते हैं।
छोटे विषयों को महत्व देकर हम अपने राष्ट्र के मान – सम्मान को चोट पहुँचा रहे हैं ,व्यक्तित्व को हानि पहुँचा रहे हैं। राष्ट्रप्रेम की गंध भी खो गई।
मैं मुंबई से पुणे तक की यात्रा के दौरान यही सोचती रही कि हम किस दिशा की ओर बढ़ रहे हैं?

ऋता सिंह

26 Nov.2015

[6/4, 1:49 pm] ritanani:

ज़िद

पनपने की, बढ़ने की ,
फिर पल्लवित होने की,
छाया प्रसारने की।
ऐ इन्सान लाख बार
बेशक़ उखाड़ो हमें बार – बार
विद्रोह न करेंगे , चुप रहेंगे हम !
हम में है जुनून फिर बस जाने का
हम में है हिम्मत फिर उगने की प्रफुल्लित होने की।
हम हैं बेख़ौफ़, बेपरवाह
तुम्हारी इन हरक़तों से।
हम में है उम्मीदें फिर बस जाने की।
याद रखना यहाँ फिर बसेरा होगा
नई ज़िंदगी पनपेंगी, उड़ान भरेंगी
यहाँ आशियाना बनेगा, चहक उभरेंगी
बहार आएगी,मौसमों के रंग बिखरेंगे।
तुम लाख क़ोशिशें कर लो ऐ इन्सान !!
तुमने आदमीयत खो दी
अहसानफ़रामोश बन गए।
पर हमें देखो
हम में अब भी जीने की ज़िद बाकी है
हम फिर सब लुटाने को तैयार हैं
हम इन्सान नहीं
कुदरत का करिश्मा हैं
हम दरख्त हैं।
ऋता सिंह
6.4.16
( कटे पेड़ को फिर जीवित होते देख )

बोल और बोली

दो शब्द अकेले दूर – दूर खड़े थे
वाक्य बनने की चाह थी सो जुड़ गए उन्हें साथ देख कई और आए और जुड़ते चले गए
वाक्यों का एक परिच्छेद बन गया
पास ही कुछ विराम चिह्न खड़े थे
चुपचाप उन्होंने अपनी – अपनी जगह चुन ली और सुंदर अर्थपूर्ण परिच्छेद बन गया।
अब कई और विचार वाक्य बन -बन जुड़ते गए ,एक नई दिशा मिल गई
देखते ही देखते कहानी बन गई।

ज़िंदगी को शब्द देकर के तो देखो
वह अपनी जगह ख़ुद ढूँढ़ लेगी
कर्मों को वाक्य का रूप देकर
ज़िदगी ख़ुद से जोड़ लेगी
ख़ुद को सजा लेगी
तुम्हारी जिंदगी मिसाल बन जाएगी और कहानी बनकर दुनिया के होठों पर होगी।
शब्द देकर तो देखो!!
ऋता सिंह
5 Dec.

बिछड़ाव

आज आख़री बार लिपटकर लौटा हूँ
उस इमली के पेड़ से, जिस पर मैं
बचपन में रोज़ चढ़ा करता था
स्कूल के बस्ते में कच्ची-पकी इमलियाँ भरा करता था।

आज अचानक सुबह – सुबह ही
समाचार पत्र पढ़कर
न जाने क्यों मेरा दिल भर आया।
रोड वाइडनिंग की योजना तहत
वे इमली के वृक्ष कटने जा रहे थे।
मैं पैंसठ की दशक में पहुँच गया
जहाँ मैं अभी स्कूली जीवन जी रहा था।
हर रोज़ आते-जाते इमलियों से
अपनी जेबें भरा करता था
कच्ची-खट् टी लाल-लाल-सी इमलियाँ रोज़ बिना भूले तोड़ा करता था।

हाथ छिलते,पैर कटते,पैंट और कमीज़ की रोज़ जेबें फटतीं सेफ्टीपिन लगा – लगाकर माँ की नज़रों से बचता,
इमली के पत्ते घावों पर घिस लेता
पर इमलियाँ तोड़ने और पेड़ों पर चढ़ने का जुनून कहाँ कम पड़ता।

हालाँकि सारे खाए भी न जाते
दूसरी सुबह बस्ता सारा उँडेलकर खाली कर जाता
बची इमलियाँ कूड़ेदान के हवाले करता और नए उत्साह से पेड़ों पर चढ़ने का मनसूबा बना लेता।

आज उस पेड़ पर चढ़ने की क्षमता तो नहीं पर एक पुराना रिश्ता कहीं याद आ गया।
सैर करने को निकला तो अनायास कदम उसी ओर बढ़े ।
पेड़ से लिपटकर मैं यों रोया मानो
बिछड़ते दोस्त को रोई अलविदा कह रहा हो।
सड़क चलते लोग मुझे देख हँसते
कोई पागल समझ आगे को निकल जाता, तो कोई मुझ पर तरस खाकर पल भर रुक जाता ।

किसी को मैं क्या समझाता कि वह वृक्ष मेरा कौन था।
बढ़ते शहर की इस भीड़ में आज वह बलि चढ़ने जा रहा था।
ऊँचाई को छूती विशाल उसकी टहनियाँ
फलों से लदी पड़ी टहनियाँ
लाखों खगों का आशियाना थीं वे टहनियाँ
बेज़बान बेसहारा,बेक़सूर पेड़
आज बेखबर कटने को था।
मानव की इच्छा के आगे मजबूर था
दुनिया की नज़रों में मैं बूढ़ा पागल था
पर मैं जानता हूँ अतीत के सुखद स्मृति को हमेशा के लिए खोने के गम से मैं उससे लिपट लिपट बस विलाप कर रहा था।

ऋता सिंह

 

नारी तुझे प्रणाम

जिसने जन्म दिया, छाती से लगाया
पोषण किया , हृदय का साहस बढ़ाया
संस्कार दिए, मार्गदर्शन किया स्नेह का वात्सल्य का बीज बोया,

वह स्त्री थी।

जिसने राखी के बंधन का अर्थ समझाया,सुख – दुख बीमारी में सर्वस्व त्याग सुरक्षा के लिए सदा दौड़ी आई, मुझेे खुशी देने को हर खुशी का त्याग करती रही , पहले हर जगह पर उसने मुझे पहला अधिकार दिया वह त्याग की मूरत
वह स्त्री थी।

जिसने प्रेम का अर्थ समझाया
अपना घर छोड़ मेरा घर बसाया
मेरे तन को क्लांति से आराम दिलाया
चार दीवारोंवाली जगह को घर बनाया
मेरे हर निर्णय पर साथ दिया सम्मान किया ,चिंताओं को दूर किया,
मेरे माता- पिता की सेवा की,
अपनी इच्छाओं का दमन किया,
मुझे पिता का दर्ज़ा दिया
वह स्त्री थी

वह जो घर से निकलने से पूर्व मेरे गाल पर चुंबन देती,घर लौटने पर दौड़कर आती, गले से लिपट जाती, झूलती
दवा, हैलमेट, रुमाल, पकड़ाती,
डोली में बैठने से पहले मुझसे लिपट रोई थी और आज फोन करके सबसे पहले पूछती है कैसे हो पापा ?
घर का पता जेब में रखकर घर से निकलना, अकेले कहीं न जाना,अपना ख्याल रखना कहनेवाली
वह भी स्त्री है।

वह जो मुझे सुबह गरम चाय पिलाती, साथ अखबार पकड़ाती, गरम नाश्ता खिलाती , नहाने से पहले गरम पानी, तौलिया, साबुन, कपड़े सब जगह पर रख आती, गंदे कपड़े धुलवाती,बाहर से लौटूँ तो पानी का गिलास पकड़ाती, पंखा चला देती, दवा -दारू करती, चश्मा, छत्री,पकड़ाती ,नाखून काट देती, बिछौना लगा देती ,थकने पर सिर-पैर दबाकर सेवा करती और घर के सब विषयों पर मेरा मत ज़रूर पूछती मेरी बहू
वह भी स्त्री है।

मैं पुत्र , भ्राता ,पति , पिता , ससुर हूँ
नारी जाति का सम्मान करता हूँ
समस्त नारी जाति को सृष्टि के सृजन का कारण समझ शत – शत प्रणाम करता हूँ।
ऋता सिंह