मेरी डायरी के पन्ने से……

मेरी डायरी के पन्ने से……
वह मेरा घर भरा पूरा सा ,
खिला – खिला सा
जैसे हो कोई उपवन – सा!

बरामदे में बैठे बुज़ुर्गों का
हुक्का गुड़गुड़ाना , कश भरना
भीतर रसोई में खुशी से
घर की बहु – बेटियों का
सौ – सौ रोटियाँ सेंकना
मेहमानों का ताँता लगा रहना
दरवाज़े पर लगी चीक उठाकर
नौकरों का हरदम आना-जाना
चिलम भर- भरकर कर लाना
बरामदे के ऊँचे खंभों को घेर
घर के बच्चों का खेलना – दौड़ना
रस्सी कूदती , फाँदती नन्ही गुड़ियाँ
कॉलेज पढ़ती बेटियाँ उनका हँसना
किसी भी बात पर खूब खिलखिलाना
नवयुवकों का बदलते परिवेश पर
दिन-रात चर्चा करनते रहना
घर की औरतों का जेवर बनाना
कभी तुड़वाना तो कभी गढ़वाना
घर की वृद्धाओं का सरौते से
सुपारी काट – काटकर
पान बना – बनाकर खाना – खिलाना
शाम होते ही शतरंज ताश कैरम
के लिए मेज़ों का सज जाना
शरबत, लस्सी गिलासों में
भर – भर कर लाना ले जाना
था वह मेरा घर भरा-पूरा सा
खिला – खिला सा
जैसे हो कोई उपवन सा!

घर की बेटियाँ जब ब्याही जाने लगीं
शहनाई की बजती धुन के साथ
सिसकियाँ सुनाई देने लगी।
जब आई नई बहुएँ,
नल का पानी बस बहने लगा
कल तक जो चूल्हा
दिन रात जला करता था
वह शाम से पहले ही
बुझाया जाने लगा
पुराने नौकर नाकाम ,नालायक कहलाने लगे
वर्षों से जो सेवाजुट थे
अब अपने घर भेजें जाने लगे
बिखरने लगा मेरा वह घर
जो था कभी उपवन सा।

फिर चली एक तीव्र आँधी
शहर में जा बसने की
घर के धंधे छोड़ – छोड़
नौकरी पर जाने की
एक – एक कर निकल गए सब
बच्चे , युवा ,औरतें
रह गए बाकी और खाली
चिलम,हुक्का,चूल्हे , सरौते
अब बना यह घर चूहों कबूतरों
चमगादड़ों का डेरा
उजड़ गया वह घर मेरा
जो था कभी उपवन सा!

यहाँ अब दीवार से चूना घिसने लगा
सीलन भरी दीवार से पौधा झाँकने लगा
मेरी बूढ़ी आँखों की रोशनी
धुँधली सी पड़ने लगी
साँझ की बेला में उखड़ती साँसें
हवा को देती हैं दुहाई
नल के नीचे पड़े जूठे बर्तन
न जाने कब से हैं पड़े
राख की कमी जो है
वे अब तक न गए माँजे
दरवाज़े पर लगी चीक
तार – तार सी हो गई
हवा के चलने पर वे
साँय – साँय सी करती हैं
मानो बूढ़े फेफड़ों की धौंकनी चलती है
खाँसती बुढ़िया चार कंधों की
प्रतीक्षा में है बैठी
मेरा यह आहत हृदय
बूढ़ी आँखें सारे दर्द हैं सहती
पूछता हूँ आँगन के ऊपर
टिमटिमाते हुए तारों से
कहाँ खो गया मेरा वह घर
भरा पूरा सा, खिला खिला सा
हरा भरा किसी उपवन सा।
ऋता सिंह
21 जनवरी 2003

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