मेरी डायरी के पन्ने से……
आकाश में बादल छा गए और हल्की – हल्की वर्षा की फुहारें पड़ने लगीं,मिट्टी की सौंधी खुशबू ने बचपन की याद दिला दी। तब चार बूँदें बारिश के गिरते ही हम बच्चे घर से निकल आते और भीगने के लिए आतुर हो उठते। आज मन भीगने के लिए फिर आतुर हो उठा। हर रोज़ टैक्सी से घर लौटता हूँ तो सफर के दौरान मेरी नज़रें या तो मोबाइल पर टिकी रहती हैं या फिर लैपटॉप पर काम करता रहता हूँ।

अचानक खुद पर न जाने क्यों तरस – सा आया कि क्यों स्वयं को इन इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में उलझा डाला!! खेल – खिलौने वाला बचपन कब काफुर हो गया , इंजीनियरिंग पढ़ने के लिए अनेकों ट्यूशन क्लासेस में जोत दिया गया और मुट्ठी में बंद बालू की तरह वक्त हाथ से कब फिसल गया मुझे पता ही न चला, जवानी कब आई और इलेक्ट्रॉनिक तारों के साथ बाँध दिया गया इसका भान ही नहीं रहा। आज अचानक मन किया फिर भीगूँ, सड़क पर चलूँ, चलते हुए दुकानों को, लोगों को देखूँ और बच्चों को भी सड़क पर, मैदानों पर खेलते , भीगते हुए देखने का आनंद लूँ।

अभी शाम के साढ़े छह ही बजे थे, गर्मी का मौसम भी है अंधेरा न हुआ था तो और भी मज़ा लेने की कल्पना से मेरा शरीर रोमांचित हो उठा। रश्मि को फोन करके बताया कि मैं देर से आऊँगा, चलकर बारिश का आनंद लेता आऊँगा तो उसने तुरंत कहा , ” काश ! मैं भी बारिश में भीग सकती!! एन्जॉए डियर ।” कहकर उसने फोन रख दिया। क्षण भर के लिए उसकी इस इच्छा का मैं अनुमान लगा बैठा कि मेरी ही तरह सफलता की दौड़ में रश्मि भी अपना यौवन वक्त से पहले ही खो बैठी थी।

एनीवेज़ , मैं दफ्तर से निकला तो हल्की फुहारों ने मेरा स्वागत किया, लैपटॉप दफ़्तर में छोड़ आया था , मोबाइल ऑफ़ कर दिया और पूरी तरह से भीगने का मन बनाकर सड़क पर चल पडा़! कई गाड़ियों ने कीचड़ उछाले ,कपड़े गंदे हुए । मैं इन सबके लिए तैयार नहीं था क्योंकि सड़क पर चलने की आदत शायद बीस साल पहले ही छूट गई थी। मैं मन ही मन हँसा कि कल तक अच्छी लगने वाली आदतें क्यों अचानक खो गईं और हम कृत दासों की तरह अपने ऑफिस के काम में उलझते गए??
बारिश की कुछ बूँदें पलकों पर गिरींऔर गाल पर से ढुलकने लगीं , मैंने जीभ निकाल कर उन्हें चाट लिया और फिर बचपन का वह खेल याद आया जब हम सब बच्चे ज्यादा से ज्यादा लंबी जीभ निकालने की स्पर्धा में जुट जाते जिसे हम छिपकली की जीभ कहते थे। फिर मन ही मन मुस्कराने लगा।

चलते – चलते अचानक ध्यान आया कि अब तक दो किलोमीटर चल चुका था ,सब तरफ गगनचुंबी इमारतें दिखाई दीं पर एक भी मैदान या बगीचा नज़र न आया। कहीं कोई बच्चे खेलते हुए नज़र नहीं आए । सड़क पर अनेकों स्कूटर, कार ,मोटर साइकिलें नज़र आईं मानो सब कहीं भाग से रहे हों पर खेलते हुए, बारिश का आनंद लेते हुए बच्चे कहीं भी न दिखाई दिए। दफ़्तर से मेरा घर आठ किलोमीटर के अंतर पर है पर इस सफर के दौरान केवल इमारतें ही इमारतें दिखाई दीं। कॉन्क्रीट जंगल।न पेड़ न हरियाली, न खेलते हुए बच्चे।

मन चिंतित और व्याकुल हो उठा। तो क्या हम एक ऐसी पीढ़ी गढ़ रहे हैं जो पैदाइशी इलेक्ट्रॉनिक गेम्स खेलती हुई बड़ी होगी !! स्वास्थ्य जिनका खराब होगा! जो केवल टीव्ही , कंप्यूटर गेम्स से परिचित होंगे!! जिन बच्चों के फेफड़ों ने कभी पूरी तरह ऑक्सीजन भरना ही न सीखा होगा!! जो मैदानी खेलों के आनंद से वंचित होंगे!! जो सोशल स्किल से अपरिचित होकर एकाकी जीवन जीना सीखेंगे!! सड़कों पर पेड़ – पौधे , शाल्मली, बकुल, गुलमोहर,अमलतास ,इमली, पीपल,वट नीम आदि वृक्ष भी नहीं दिखते ,न बगीचे ही हैं !! तो क्या आनेवाली पीढ़ी इन सब सुंदर वृक्षों की तस्वीरें देखकर ही उन्हें पहचानेगी!!

मेरा मन व्यथित हो उठा। ये क्या हो रहा है ? हम यह क्या कर रहे हैं ! क्षण भर में विचार कौंधा कि अगली पीढ़ी रोबोट होगी , संवेदना शून्य! जिसने प्रकृति का आनंद न लिया हो वह मानव बन ही नहीं सकता।

मैं तन से पूरी तरह बारिश के पानी से भीगा हुआ था और मन! मन व्यथित ,बोझिल और शंकित था। घर पहुँचा, बेल बजाते ही मेरा आठ साल का बेटा रोज़ की तरह दौड़ता हुआ आया मुझसे लिपटने , पर मुझे गीला देख तुरंत बोला ,” ओह नो!! पापा आप आज डर्टी हो ,आई विल नॉट हग यू।” तुरंत रश्मि रसोई से निकल आई और मुझ से लिपट गई बोली, ” बारिश के पानी में भीगने का थोड़ा सुख तुमसे लिपटकर ही ले लेती हूँ। आई मिस्ड इट!”
तो क्या हमारी पीढ़ी अंतिम पीढ़ी है जो प्रकृति से जुड़ी थी!!
कहाँ बारिश में भीगने , गीले पर्यावरण का आनंद लेने निकला था ,बचपन को एक बार फिर जीना चाहता था और लो कहाँ सच्चाई नज़र आ गई ,मन व्यथित हो उठा आज।
ऋता सिंह
3/6/18
9.30 pm

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