भूल
कुछ समय से दमा की तकलीफ ने जीना दुश्वार कर रखा था। धीरे – धीरे शरीर की सारी संचित शक्ति मानो खाँसने में ही निकलती जा रही थी। खांँसी के कारण बैठकर हाँफते हुए रात निकल जाती और दिनभर लेटे पड़े रहने को जी चाहता।
जो मित्र मिलने आते अपनी तरफ से कई उपाय बताते जाते और कष्टों से मुक्ति पाने के लिए मैं हर उपाय को आजमाती, पर मेरा कष्ट कहीं कम न होता।

एक दिन मुझसे मिलने कुछ पुरानी सखियाँ आईं। मेरी हालत देखकर उन सबको मुझ पर बहुत तरस आया। हर कोई हज़ार प्रकार के नुस्खे बताती और मैं लिखती जीती। मेरी अवस्था मानो मरता क्या न करता मुहावरे को चरितार्थ कर रही थी।

मेरे घर की हर खिड़की पर कई पौधे लगे रहते हैं। ये सब पौधे मुझे अतिप्रिय हैं। इन पौधों पर नितदिन कई छोटे पक्षी आते ,चहकते मानो मुझेसे वे बातें करते हों। सारा दिन बिस्तर पर पड़े उनकी आवाज मेरा मनोरंजन करती हैं। उन सखियों में से एक सखी ने सुझाया कि इन पौधों में से एक खास पौधा मेरी दमा का कारण है। उसके कथन में इतना आत्मविश्वास था कि सभी अन्य सखियाँ हांँ में हाँ मिलाती रहीं और मुझ पर इन बातों का न जाने क्यों गहरा असर पड़ता गया।

मेरी असह्य तकलीफ़ों ने मुझे इतना खुदगर्ज बना दिया था कि उस पौधे को मैंने उखाड़कर तो न फेंका पर अब मैंने उस पौधे को पानी देना बंद कर दिया। रात की ओस की बूंदों को चाटकर वह भला कब तक जीवित रहता। पहले पर्ण जरर्जित हो गए, फिर वे झड़ते चले गए ,पौधा सूखता चला गया। कुछ छोटे से पक्षी उस पर आ बैठते थे , मधुर धुन सुनाते थे, उन्होंने आना बंद कर दिया। पौधा संपूर्ण मुरझा गया। मैं अब भी दमा के भयंकर प्रकोप से घिरी थी।

मैं स्वस्थ न हो सकी तो क्या यह पौधा बेकसूर ही बलि चढ़ गया। पश्चाताप से मेरा हृदय व्यथित हो उठा!!! मैंने जल्दबाजी़ क्यों की?

आज फिर एक बार उस पौधे की सूखी जड़ों में पानी डाल रही हूँ इस आशा से कि फिर शायद वह खिल उठे। एक पत्ता तो निकल आए। मैं प्रायश्चित कैसे करूँ भला !!

ऋता सिंह
9/3/17

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