दृष्टिकोण

लघु कथा

क संकरे से पुल को पार करने पर ही सारे पर्यटक एक बड़े से रेल्वेस्टेशन पर आ पहुँचते जहाँ से किसी भी दिशा की ओर ट्रेन पकड़कर जा सकते हैं। 

आजकल एशिया से भारी संख्या में पर्यटक आने लगे हैं यहाँ। उनमें कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें न जाने क्यों सब जगह पर सबसे आगे पहुँचने की जल्दी रहती है। हालाँकि ट्रेन के आने में अभी देर है पर उस संकरे से पुल पर धक्कम-धुक्की करना मानो उनका जन्मसिद्ध अधिकार ही होता है।

आज एक अल्पवयस्क व्यक्ति बहुत धीरे-धीरे पुल पर चल रहा था। उसके पीछे एक और नवयुवक बड़ी जल्दबाज़ी दिखा रहा था। उसे धीरे चलनेवाले व्यक्ति पर बड़ा गुस्सा भी आ रहा था। उसका गुस्सा अब चेहरे पर उभरता जा रहा था।
स्टेशन पर पहुँचकर दोनों एक साथ एक बैंच पर बैठ गए। धीरे चलनेवाले व्यक्ति ने अपने एक पैर से जूता निकालते हुए कहा,
” माफ़ कीजिएगा मेरे कारण आपको धीरे चलना पड़ा। मेरी टाँग घुटने से कृत्रिम है और हाल ही में लगाई है, मुझे अभी आदत नहीं हुई इसकी जिस कारण मैं तेज़ चल नहीं पाता हूँ, इसी एक ट्रेन एक्सीडेंट में छह माह पहले मेरी टाँग घुटने से कटकर छिन्न-भिन्न हो गई थी।

जल्दबाजी दिखाने वाला युवक हतप्रभ – सा रह गया।

ऋता सिंह
25 Feb 2017
Dubai

One thought on “दृष्टिकोण

  1. नमस्ते दीदी,

    एक और दृष्टिकोण, चीजों को देखने का नजरिया प्रस्तुत किया है अापने।

    बधाई
    अमित

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