मेरी डायरी के पन्ने से……

मेरी डायरी के पन्ने से……
वह मेरा घर भरा पूरा सा ,
खिला – खिला सा
जैसे हो कोई उपवन – सा!

बरामदे में बैठे बुज़ुर्गों का
हुक्का गुड़गुड़ाना , कश भरना
भीतर रसोई में खुशी से
घर की बहु – बेटियों का
सौ – सौ रोटियाँ सेंकना
मेहमानों का ताँता लगा रहना
दरवाज़े पर लगी चीक उठाकर
नौकरों का हरदम आना-जाना
चिलम भर- भरकर कर लाना
बरामदे के ऊँचे खंभों को घेर
घर के बच्चों का खेलना – दौड़ना
रस्सी कूदती , फाँदती नन्ही गुड़ियाँ
कॉलेज पढ़ती बेटियाँ उनका हँसना
किसी भी बात पर खूब खिलखिलाना
नवयुवकों का बदलते परिवेश पर
दिन-रात चर्चा करनते रहना
घर की औरतों का जेवर बनाना
कभी तुड़वाना तो कभी गढ़वाना
घर की वृद्धाओं का सरौते से
सुपारी काट – काटकर
पान बना – बनाकर खाना – खिलाना
शाम होते ही शतरंज ताश कैरम
के लिए मेज़ों का सज जाना
शरबत, लस्सी गिलासों में
भर – भर कर लाना ले जाना
था वह मेरा घर भरा-पूरा सा
खिला – खिला सा
जैसे हो कोई उपवन सा!

घर की बेटियाँ जब ब्याही जाने लगीं
शहनाई की बजती धुन के साथ
सिसकियाँ सुनाई देने लगी।
जब आई नई बहुएँ,
नल का पानी बस बहने लगा
कल तक जो चूल्हा
दिन रात जला करता था
वह शाम से पहले ही
बुझाया जाने लगा
पुराने नौकर नाकाम ,नालायक कहलाने लगे
वर्षों से जो सेवाजुट थे
अब अपने घर भेजें जाने लगे
बिखरने लगा मेरा वह घर
जो था कभी उपवन सा।

फिर चली एक तीव्र आँधी
शहर में जा बसने की
घर के धंधे छोड़ – छोड़
नौकरी पर जाने की
एक – एक कर निकल गए सब
बच्चे , युवा ,औरतें
रह गए बाकी और खाली
चिलम,हुक्का,चूल्हे , सरौते
अब बना यह घर चूहों कबूतरों
चमगादड़ों का डेरा
उजड़ गया वह घर मेरा
जो था कभी उपवन सा!

यहाँ अब दीवार से चूना घिसने लगा
सीलन भरी दीवार से पौधा झाँकने लगा
मेरी बूढ़ी आँखों की रोशनी
धुँधली सी पड़ने लगी
साँझ की बेला में उखड़ती साँसें
हवा को देती हैं दुहाई
नल के नीचे पड़े जूठे बर्तन
न जाने कब से हैं पड़े
राख की कमी जो है
वे अब तक न गए माँजे
दरवाज़े पर लगी चीक
तार – तार सी हो गई
हवा के चलने पर वे
साँय – साँय सी करती हैं
मानो बूढ़े फेफड़ों की धौंकनी चलती है
खाँसती बुढ़िया चार कंधों की
प्रतीक्षा में है बैठी
मेरा यह आहत हृदय
बूढ़ी आँखें सारे दर्द हैं सहती
पूछता हूँ आँगन के ऊपर
टिमटिमाते हुए तारों से
कहाँ खो गया मेरा वह घर
भरा पूरा सा, खिला खिला सा
हरा भरा किसी उपवन सा।
ऋता सिंह
21 जनवरी 2003

मेरी डायरी के पन्ने से……
आकाश में बादल छा गए और हल्की – हल्की वर्षा की फुहारें पड़ने लगीं,मिट्टी की सौंधी खुशबू ने बचपन की याद दिला दी। तब चार बूँदें बारिश के गिरते ही हम बच्चे घर से निकल आते और भीगने के लिए आतुर हो उठते। आज मन भीगने के लिए फिर आतुर हो उठा। हर रोज़ टैक्सी से घर लौटता हूँ तो सफर के दौरान मेरी नज़रें या तो मोबाइल पर टिकी रहती हैं या फिर लैपटॉप पर काम करता रहता हूँ।

अचानक खुद पर न जाने क्यों तरस – सा आया कि क्यों स्वयं को इन इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में उलझा डाला!! खेल – खिलौने वाला बचपन कब काफुर हो गया , इंजीनियरिंग पढ़ने के लिए अनेकों ट्यूशन क्लासेस में जोत दिया गया और मुट्ठी में बंद बालू की तरह वक्त हाथ से कब फिसल गया मुझे पता ही न चला, जवानी कब आई और इलेक्ट्रॉनिक तारों के साथ बाँध दिया गया इसका भान ही नहीं रहा। आज अचानक मन किया फिर भीगूँ, सड़क पर चलूँ, चलते हुए दुकानों को, लोगों को देखूँ और बच्चों को भी सड़क पर, मैदानों पर खेलते , भीगते हुए देखने का आनंद लूँ।

अभी शाम के साढ़े छह ही बजे थे, गर्मी का मौसम भी है अंधेरा न हुआ था तो और भी मज़ा लेने की कल्पना से मेरा शरीर रोमांचित हो उठा। रश्मि को फोन करके बताया कि मैं देर से आऊँगा, चलकर बारिश का आनंद लेता आऊँगा तो उसने तुरंत कहा , ” काश ! मैं भी बारिश में भीग सकती!! एन्जॉए डियर ।” कहकर उसने फोन रख दिया। क्षण भर के लिए उसकी इस इच्छा का मैं अनुमान लगा बैठा कि मेरी ही तरह सफलता की दौड़ में रश्मि भी अपना यौवन वक्त से पहले ही खो बैठी थी।

एनीवेज़ , मैं दफ्तर से निकला तो हल्की फुहारों ने मेरा स्वागत किया, लैपटॉप दफ़्तर में छोड़ आया था , मोबाइल ऑफ़ कर दिया और पूरी तरह से भीगने का मन बनाकर सड़क पर चल पडा़! कई गाड़ियों ने कीचड़ उछाले ,कपड़े गंदे हुए । मैं इन सबके लिए तैयार नहीं था क्योंकि सड़क पर चलने की आदत शायद बीस साल पहले ही छूट गई थी। मैं मन ही मन हँसा कि कल तक अच्छी लगने वाली आदतें क्यों अचानक खो गईं और हम कृत दासों की तरह अपने ऑफिस के काम में उलझते गए??
बारिश की कुछ बूँदें पलकों पर गिरींऔर गाल पर से ढुलकने लगीं , मैंने जीभ निकाल कर उन्हें चाट लिया और फिर बचपन का वह खेल याद आया जब हम सब बच्चे ज्यादा से ज्यादा लंबी जीभ निकालने की स्पर्धा में जुट जाते जिसे हम छिपकली की जीभ कहते थे। फिर मन ही मन मुस्कराने लगा।

चलते – चलते अचानक ध्यान आया कि अब तक दो किलोमीटर चल चुका था ,सब तरफ गगनचुंबी इमारतें दिखाई दीं पर एक भी मैदान या बगीचा नज़र न आया। कहीं कोई बच्चे खेलते हुए नज़र नहीं आए । सड़क पर अनेकों स्कूटर, कार ,मोटर साइकिलें नज़र आईं मानो सब कहीं भाग से रहे हों पर खेलते हुए, बारिश का आनंद लेते हुए बच्चे कहीं भी न दिखाई दिए। दफ़्तर से मेरा घर आठ किलोमीटर के अंतर पर है पर इस सफर के दौरान केवल इमारतें ही इमारतें दिखाई दीं। कॉन्क्रीट जंगल।न पेड़ न हरियाली, न खेलते हुए बच्चे।

मन चिंतित और व्याकुल हो उठा। तो क्या हम एक ऐसी पीढ़ी गढ़ रहे हैं जो पैदाइशी इलेक्ट्रॉनिक गेम्स खेलती हुई बड़ी होगी !! स्वास्थ्य जिनका खराब होगा! जो केवल टीव्ही , कंप्यूटर गेम्स से परिचित होंगे!! जिन बच्चों के फेफड़ों ने कभी पूरी तरह ऑक्सीजन भरना ही न सीखा होगा!! जो मैदानी खेलों के आनंद से वंचित होंगे!! जो सोशल स्किल से अपरिचित होकर एकाकी जीवन जीना सीखेंगे!! सड़कों पर पेड़ – पौधे , शाल्मली, बकुल, गुलमोहर,अमलतास ,इमली, पीपल,वट नीम आदि वृक्ष भी नहीं दिखते ,न बगीचे ही हैं !! तो क्या आनेवाली पीढ़ी इन सब सुंदर वृक्षों की तस्वीरें देखकर ही उन्हें पहचानेगी!!

मेरा मन व्यथित हो उठा। ये क्या हो रहा है ? हम यह क्या कर रहे हैं ! क्षण भर में विचार कौंधा कि अगली पीढ़ी रोबोट होगी , संवेदना शून्य! जिसने प्रकृति का आनंद न लिया हो वह मानव बन ही नहीं सकता।

मैं तन से पूरी तरह बारिश के पानी से भीगा हुआ था और मन! मन व्यथित ,बोझिल और शंकित था। घर पहुँचा, बेल बजाते ही मेरा आठ साल का बेटा रोज़ की तरह दौड़ता हुआ आया मुझसे लिपटने , पर मुझे गीला देख तुरंत बोला ,” ओह नो!! पापा आप आज डर्टी हो ,आई विल नॉट हग यू।” तुरंत रश्मि रसोई से निकल आई और मुझ से लिपट गई बोली, ” बारिश के पानी में भीगने का थोड़ा सुख तुमसे लिपटकर ही ले लेती हूँ। आई मिस्ड इट!”
तो क्या हमारी पीढ़ी अंतिम पीढ़ी है जो प्रकृति से जुड़ी थी!!
कहाँ बारिश में भीगने , गीले पर्यावरण का आनंद लेने निकला था ,बचपन को एक बार फिर जीना चाहता था और लो कहाँ सच्चाई नज़र आ गई ,मन व्यथित हो उठा आज।
ऋता सिंह
3/6/18
9.30 pm

अरमान

आदित्य अवस्थी कुछ अपने तरीके से अपनी शर्तों पर और कुछ अलग ढंग से जीवन जीने में विश्वास रखते थे । बहुत कम उम्र में वे इंग्लैंड चले गए थे। अपने बलबूते पर अच्छा धन कमाया और अपने व्यापार को सफलता की चरम सीमा तक ले गए। उन्हें आदित्य नाम से अधिक प्रिय ऐडी था क्योंकि वे इसी नाम से इंग्लैंड में मशहूर थे। वे साल में एक बार भारत ज़रूर आते थे। यहाँ का सोशल लाइफ उन्हें बहुत भाता था। मुंबई उनका पसंदीदा शहर रहा है। वे इसे ‘ हैपनिंग सिटी ‘ कहते थे।
लंबे समय तक इंग्लैंड में रहने के कारण उन्हें गर्मी में हाफ़शर्ट और सर्दियों में कोट टाई पहनने की आदत थी। यद्यपि मुंबई के अन्य निवासियों को शायद ही कभी कोट पहनने की ज़रूरत महसूस होती होगी पर ऐडी को यही लिबास पसंद था। एक और खासियत थी,वे मुँह में हमेशा पाईप रखते थे। गोल भारी चेहरा, ओठों पर मुस्कान , चौड़ी छाती,सिर पर घने कच्चे – पके बाल और गेहुँआ वर्ण। कुल मिलाकर आकर्षक व्यक्तित्व , सुपुरुष व्यक्ति।
क्लब में आनेवाली ‘ सो कॉल्ड मॉडर्न ‘ महिलाएँ उनसे घनिष्ठता बढ़ाने की ताक में रहतीं और ‘ ऐडी डार्लिंग ,’ कहकर कई महिलाएँ उन्हें संबोधित भी करतीं। ऐडी मुस्करा देते और पाइप से धुआँ छोड़ते मानो उन्हें हवा में उड़ा दिया हो। अमीर और आकर्षक व्यक्ति को  सभी ज्यादा चाहते हैं। पर ऐडी की पारखी नज़रें थीं वे किसी को पास फटकने भी नहीं देते थे।
ताश और बिलिएड्स के आला शौक़ीन थे। लॉन्ग ड्राइव भी बहुत पसंद करते थे अगर कुछ नापसंद था तो वह थी बारिश। तीस – पैंतीस वर्ष इंग्लैंड में रहकर वे बारिश और भयंकर शीत से नफ़रत करते थे। मुंबई शहर शायद इसीलिए उन्हें अधिक भाया और बावन साल की उम्र में अपना सारा बिज़नेस वाइंड आप करके वे यहीं आकर बस गए। धन की कोई कमी न थी। एक पॉश लोकैलिटी में बढ़िया घर लिया , सारी सुख-सुविधाएँ जुटाई और फुल्ली रिटायर्ड मैन की खुशहाल जिंदगी गुजारने लगे। यहाँ यह कहना भी जरूरी है कि वे एक हैंडसम बैचेलर भी थे। नैन्सी बॉम्बे क्लब की देखरेख किया करती थी। आकर्षक व्यक्तित्व,शालीन व्यवहार, मृदुभाषी महिला । उसकी एक खासियत थी कि वह हमेशा लंबे ड्रेस पहना करती थी। यद् यपि क्लब में काम करती थी पर कपड़े ऐसे होते जिससे शरीर का कोई हिस्सा कहीं से भी झाँकता हुआ न दिखता। क्लब में सबके साथ उसके संबंध बहुत अच्छे थे जिस कारण कई मर्द उसके दीवाने भी थे। चालीस के क़रीब उसकी उम्र थी , सामाजिक उसूलों को निभाने के साथ – साथ अपनी मर्यादा में रहना जानती थी। कुछ मनचले मर्द थे जो नैन्सी का स्पर्श और शायद एकाध रात उसके साथ गुज़ारने की ख्वाहिश रखते थे। पर उसने भी कच्ची गोलियाँ नहीं खेली थीं , वह उन्हें खूब टालना जानती थी। चूँकि वह क्लब में काम करती थी तो लोगों को लगता था वह एवेलेबल औरत है। पर यह मर्दों की भारी भूल है और कमजोरी भी।
ऐडी और नैन्सी अच्छे दोस्त बने । दोनों के कुछ हद तक पसंद भी एक जैसे ही थी।
साल दो साल की दोस्ती में कई बार साथ में लंबी ड्राइव पर गए, साथ डिनर करते रहे और इन्हीं बातों के बीच ऐडी ने उसे जीवन साथी बन जाने का प्रस्ताव भी दिया।
कुछ समय के लिए दोनों क्लब से गायब रहे। आदतन लोग कई अफ़वाहें उड़ाते रहे,कई मनगढ़ंत कहानियाँ क्लब में रंग जमाने लगीं और लोग उन सबका आनंद लेकर अपना मनोरंजन भी करने लगे।
इधर ऐडी नैन्सी को लंडन ले गया। वहाँ एक आलीशान मकान में रहने वाली तीस वर्षीय महिला मारिया से परिचय करवाया जो ऐडी की प्रेमिका लूसी की बेटी थी। लूसी विधवा और अत्यंत अमीर स्त्री थी जो ऐडी के पड़ोस में लंडन में रहती थी। ऐडी ने इस बेटी को एक सच्चे और अच्छे पिता का स्नेह दिया। लूसी ऐडी से उम्र में बहुत बड़ी थी। पर उसे ऐडी पर बहुत भरोसा था जिस कारण उसने अपनी संपत्ति का आधा हिस्सा ऐडी के नाम कर दिया था। उस धन से ऐडी ने खुद को एक सफल बिज़नेस मैन बना दिया। कुछ तीन चार साल पहले एक रोड एक्सीडेंट में लूसी की मौत हो गई। उसकी सारी संपत्ति उसकी बेटी को सौंपकर ऐडी भारत में आकर बस गया। ऐडी लूसी से बहुत प्रेम करता था पर उसकी अचानक मृत्यु होने पर ऐडी को भारी धक्का लगा था। ऐडी ने लूसी से शादी नहीं की थी पर वे बिसनेस पार्टनर थे ,लिव इन रिलेशनशिप था उनका। मारिया को पिता का भरपूर स्नेह मिला और विश्वास भी। पाश्चात्य सभ्यता के अनुसार उन दोनों के रिलेशनशिप समाज की नज़रों में जायज़ था।
ऐडी अपनी बेटी मारिया से नैन्सी का परिचय करवाने के लिए उसे लंडन लेकर गया था। नैन्सी ऐडी के बारे में सब कुछ जानती थी फिर भी उसे इस तरह लंडन लाकर सारी बातें स्पष्ट रूप से बताने और दिखाने पर नैन्सी के मन में ऐडी के प्रति सम्मान और समर्पण की भावना जागृत हुई। मारिया से परिचित होकर नैन्सी को बहुत अच्छा लगा । उसकी सकारात्मक दृष्टिकोण, खुले विचार , मिलनसारिता और ऐडी के प्रति उसका स्नेह सब कुछ बहुत पारदर्शी था। नैन्सी को वह लूसी की जगह देना चाहता था यह जानकर वह भी प्रसन्न हुई।

ऐडी ने कुछ मित्रों को आमंत्रित किया, सारी व्यवस्था मारिया ने की और भारत लौटने से एक दिन पूर्व ऐडी ने नैन्सी को रिंग पहनाई !! शानदार पार्टी दी गई और दोनों भारत लौट आए। फिर शुरू हुआ एक और लिव-इन रिलेशनशिप का सिलसिला।
पर इस बार यह भारत में था। नैन्सी और ऐडी सिर्फ इस बात को जानते थे !
माह भर बाद दोनों फिर क्लब लौट आए , ऐडी ने सबसे कहा कि वह उसे अपना लाइफ पार्टनर बना चुके थे। लोगों ने पार्टी की माँग की तो वह भी दी गई। जो नैन्सी पर डोरे डालने के प्रयास में थे उनके दिल पर तो साँप लोट गया , मानो हाथ के तोते उड़ गए। वे महिलाएँ जो ऐडी पर फंदे कसने के चक्कर में थीं,उनका दिल टूट गया।
नैन्सी अब चमचमाती कार में ऐडी के साथ आती और देर रात दोनों साथ घर जाते।
ऐडी का जीवन भी बदल गया था। दोनों सुबह जिम जाते, साथ – साथ तैरते खुश दिखाई देते। मोहल्ले वाले भी उन्हें मिस्टर एंड मिसेस अवस्थी कहकर संबोधित करते। नैन्सी एक अच्छी लाइफ पार्टनर थी, सुगृहणी थी । उसने कभी ऐडी को परेशान होने या शिकायत का मौक़ा ही नहीं दिया। उसके ओंठों पर सदा जादुई मुस्कराहट रहती और तत्परता से हर काम को निपटाने की कला भी। हर सवाल का जवाब था उसके पास। ऐडी उससे बहुत खुश था। घर पर भी पार्टियाँ होती और नैन्सी बड़े उत्साह से सबका आयोजन करती ,एक सफल मेज़बान की भूमिका भी निभाती। लोग ऐडी को लकी मैन कहते और नैन्सी की प्रशंसा करते न थकते।
देखते – देखते ज़िंदगी के सुखद बीस वर्ष कट गए। इस बीच मारिया अपने बच्चों को लेकर दो – चार बार भारत आई , नैन्सी और ऐडी हर साल माह भर के लिए लंडन जाते रहे। मारिया के बच्चे नैन्सी को ग्रैनी पुकारते तो वह गद् गद् हो उठती। उसके मन के भीतर एक उथल पुथल – सा मच जाता। मारिया की चार संतानें थीं, नैन्सी ने एक बच्चे को गोद लेने की बात छेड़ी थी एक बार पर ऐडी ने जवाब में यही कहा कि गोद लेने की क्या ज़रूरत है ,हमारे ही बच्चे हैं वे , और नैन्सी तड़पकर रह गई थी।
नैन्सी अब त्रेसठ वर्ष की थीं और ऐडी पचहत्तर वर्ष का। लंडन से मारिया अपने जवान बच्चों के साथ मुंबई आई , पिता का पचहत्तरवाँ जन्मदिन मनाने का आयोजन किया गया। आलिशान होटल में बड़ी संख्या में मित्रों को आमंत्रित किया गया।
एक सफल शानदार पार्टी में मारिया ने ऐडी के गुणों का बखान किया और उसके ऐडी से कोई रिश्ता न होते हुए भी पिता की कमी न होने देने की बात सबके सामने रखी। उसके बच्चों ने ऐडी से जो नाना का स्नेह पाया उसका भी जिक्र किया। उपस्थित लोग ऐडी की महानता पर बहुत प्रसन्न हुए और उसकी खूब प्रशंसा की।

नैन्सी को सब कुछ बहुत अच्छा लग रहा था बस रह-रहकर दिल में एक टीस सी उठती थी कि काश ये सारे रिश्ते सच्चे और पक्के डोर से बँधे होते!!
दूसरे दिन सुबह नैन्सी बाथरूम गई ,जब बहुत देर तक वह नहीं लौटी तो ऐडी दरवाजा खटखटाने लगा पर नैन्सी ने कोई उत्तर नहीं दिया। मारिया और उसका पूरा परिवार तुरंत ऐडी के कमरे में पहुँचा, सभी समझ गए कि कुछ गड़बड़ है। फायरब्रिगेड को बुलाया गया , मुहल्ले के कुछ लोग भी आ गए। दरवाज़ा तोड़ा गया तो नैन्सी फ़र्श पर गिरी पड़ी थी और सिर से काफ़ी खून बह चुका था। नैन्सी सिवियर हार्ट फेल के कारण चल बसी थी। नैन्सी का अंतिम संस्कार हुआ , वह ईसाई धर्म को मानती थी अत: उसे दफनाया गया।
ऐडी इस उम्र में लाइफ पार्टनर को खोकर बिल्कुल टूट गए। मारिया के बच्चे लौट गए पर वह ऐडी के पास कुछ और दिन के लिए रुक गई।
एक दिन ऐडी ने नैन्सी के वॉर्डरोब की चाबी मारिया को देते हुए कहा कि नैन्सी शौकीन थी , उसके जो भी हीरे – मोती और अन्य जवाहरातों के गहने थे उन्हें वह ले जाए। मरियम ने अनिच्छा से अलमारी खोली तो वह हैरान रह गई ! अलमारी के बाएँ दरवाज़े पर असंख्य छोटे छोटे चिट्स लगे थे। सभी इंग्लिश में लिखे गए थे, उसके और ऐडी के बीच प्रगाढ़ प्रेम ज़रूर था पर लिव इन रिलेशनशिप के कारण नैन्सी के दिल में एक दर्द था, कई चिट्स पर माँ बनने का सौभाग्य न मिलने का दुख था। कई बच्चों के छोटे चित्र थे जिसके नीचे उसने लिखा था क्या तुम मेरी संतान बनोगे! चिट्स असंख्य थे पर भाव एक – मातृत्व की पूर्णता का अभाव, पत्नी का लिखित दर्ज़ा पाने का  अधूरा अरमान!!!
पाश्चात्य संस्कृति में शायद यह स्वीकृत संबंध हैं पर इस देश की नारी शायद आज भी विवाह के बंधन को महत्त्व देती हैं। मारिया ने सारे चिट्स एकत्रित कर ऐडी को दिए ,उन्हें पढ़कर वह हतप्रभ और अवाक रह गया।

नैन्सी को गुजरे अभी कुछ ही दिन हुए थे । मारिया के भी जाने का समय हो गया था। ऐडी मारिया को साथ लेकर कब्रिस्तान गया और एक सुंदर टूंबस्टोन लगा आया जिस पर लिखा था –
नैन्सी अवस्थी, वाइफ़ ऑफ ऐडी अवस्थी रेस्टस हियर ।
ऋता सिंह
22/2/18

बाबा

बाबा आज तुम्हारे कंधे की याद हो आई
जिस पर मुझे बिठा तुम कहते
” बिटिया मेरी हिमालय पर चढ़ेगी ”
मेरा हाथ पकड़ चलाते और कहते
” बिटिया मेरी दुनिया की सैर करेगी ”
मेरे लिए कभी शेर तो कभी घोड़ा बन जाते
और कहते,” बिटिया मेरी सारी दुनिया पर राज करेगी ।”
बाबा , हर बार ख़ुदा ने कहा   ‘ आमीन ‘
मुझे सारी दुनिया मिल गई ,
जन्नत की खुशियाँ मिल गई
पर बाबा, तुम तो तस्वीर बन गए
सच कहूँ मेेरी हर यात्रा
मेरी हर सफलता
मेरी हर खुशी
तुम्हारी ही तो देन है।
ऋता सिंह
18/6/2017
Father’s day

 

संवेदनाओं की कुंजी हो,
मन:स्थल तुम्हारा उद् गम स्थल है
मस्तिष्क क्रियान्वित करता है
शब्द बन – बनकर तुम अभिव्यक्त होती हो
हे कविता, तुम मेरी शैली हो ।
जब तुम्हारा उद् भव होता है
विचारों के उथल – पुथल में
संवेदनाओं का मंथन होता है
मैं, मैं नहीं रह जाती हूँ
तुम गीत बन बह जाती हो
तुम मेरे अंतस्थल में
सदा प्रवाहित होती हो।
हे कविता, तुम मेरी शैली हो ।
ऋता सिंह
21 st of March 2017
World’s poet day

भूल
कुछ समय से दमा की तकलीफ ने जीना दुश्वार कर रखा था। धीरे – धीरे शरीर की सारी संचित शक्ति मानो खाँसने में ही निकलती जा रही थी। खांँसी के कारण बैठकर हाँफते हुए रात निकल जाती और दिनभर लेटे पड़े रहने को जी चाहता।
जो मित्र मिलने आते अपनी तरफ से कई उपाय बताते जाते और कष्टों से मुक्ति पाने के लिए मैं हर उपाय को आजमाती, पर मेरा कष्ट कहीं कम न होता।

एक दिन मुझसे मिलने कुछ पुरानी सखियाँ आईं। मेरी हालत देखकर उन सबको मुझ पर बहुत तरस आया। हर कोई हज़ार प्रकार के नुस्खे बताती और मैं लिखती जीती। मेरी अवस्था मानो मरता क्या न करता मुहावरे को चरितार्थ कर रही थी।

मेरे घर की हर खिड़की पर कई पौधे लगे रहते हैं। ये सब पौधे मुझे अतिप्रिय हैं। इन पौधों पर नितदिन कई छोटे पक्षी आते ,चहकते मानो मुझेसे वे बातें करते हों। सारा दिन बिस्तर पर पड़े उनकी आवाज मेरा मनोरंजन करती हैं। उन सखियों में से एक सखी ने सुझाया कि इन पौधों में से एक खास पौधा मेरी दमा का कारण है। उसके कथन में इतना आत्मविश्वास था कि सभी अन्य सखियाँ हांँ में हाँ मिलाती रहीं और मुझ पर इन बातों का न जाने क्यों गहरा असर पड़ता गया।

मेरी असह्य तकलीफ़ों ने मुझे इतना खुदगर्ज बना दिया था कि उस पौधे को मैंने उखाड़कर तो न फेंका पर अब मैंने उस पौधे को पानी देना बंद कर दिया। रात की ओस की बूंदों को चाटकर वह भला कब तक जीवित रहता। पहले पर्ण जरर्जित हो गए, फिर वे झड़ते चले गए ,पौधा सूखता चला गया। कुछ छोटे से पक्षी उस पर आ बैठते थे , मधुर धुन सुनाते थे, उन्होंने आना बंद कर दिया। पौधा संपूर्ण मुरझा गया। मैं अब भी दमा के भयंकर प्रकोप से घिरी थी।

मैं स्वस्थ न हो सकी तो क्या यह पौधा बेकसूर ही बलि चढ़ गया। पश्चाताप से मेरा हृदय व्यथित हो उठा!!! मैंने जल्दबाजी़ क्यों की?

आज फिर एक बार उस पौधे की सूखी जड़ों में पानी डाल रही हूँ इस आशा से कि फिर शायद वह खिल उठे। एक पत्ता तो निकल आए। मैं प्रायश्चित कैसे करूँ भला !!

ऋता सिंह
9/3/17

दृष्टिकोण

लघु कथा

क संकरे से पुल को पार करने पर ही सारे पर्यटक एक बड़े से रेल्वेस्टेशन पर आ पहुँचते जहाँ से किसी भी दिशा की ओर ट्रेन पकड़कर जा सकते हैं। 

आजकल एशिया से भारी संख्या में पर्यटक आने लगे हैं यहाँ। उनमें कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें न जाने क्यों सब जगह पर सबसे आगे पहुँचने की जल्दी रहती है। हालाँकि ट्रेन के आने में अभी देर है पर उस संकरे से पुल पर धक्कम-धुक्की करना मानो उनका जन्मसिद्ध अधिकार ही होता है।

आज एक अल्पवयस्क व्यक्ति बहुत धीरे-धीरे पुल पर चल रहा था। उसके पीछे एक और नवयुवक बड़ी जल्दबाज़ी दिखा रहा था। उसे धीरे चलनेवाले व्यक्ति पर बड़ा गुस्सा भी आ रहा था। उसका गुस्सा अब चेहरे पर उभरता जा रहा था।
स्टेशन पर पहुँचकर दोनों एक साथ एक बैंच पर बैठ गए। धीरे चलनेवाले व्यक्ति ने अपने एक पैर से जूता निकालते हुए कहा,
” माफ़ कीजिएगा मेरे कारण आपको धीरे चलना पड़ा। मेरी टाँग घुटने से कृत्रिम है और हाल ही में लगाई है, मुझे अभी आदत नहीं हुई इसकी जिस कारण मैं तेज़ चल नहीं पाता हूँ, इसी एक ट्रेन एक्सीडेंट में छह माह पहले मेरी टाँग घुटने से कटकर छिन्न-भिन्न हो गई थी।

जल्दबाजी दिखाने वाला युवक हतप्रभ – सा रह गया।

ऋता सिंह
25 Feb 2017
Dubai

चमकता सितारा

फ़लक़ के सबसे चमकीले सितारे को देख
ज़हन में सवालात उठे
ख़ुद की इस चमक को बरकरार रखने को
न जाने कितनी सदियों से वह
जलता आ रहा होगा
क़ायनात के न जाने किन आफ़ताबों से
रोशनी इकट् ठी करता रहा होगा
पर कमाल का जुनून है उसका
इस धरती तक एक दिन
अपनी रोशनी पहुँचाएगा
इस जहाँ का वह ही
अकेला आफ़ताब कहलाएगा।
हर सितारे की शायद यही मंशा होती है
सबसे चमकीला बनना
आसान भी तो नहीं होता होगा!!!
ऋता सिंह
4/3/2017
7.15 pm

साल मुबारक़

देखो आज मैंने द्वार खोल रखे हैं
इसी खुले द्वार से
तुम सब कई बार आए हो
मुझसे मिलने
कभी मुझे बधाई देने
कभी मेरी ख़बर लेने
तो कभी ढाढ़स बँधाने
तो कभी संवेदना जताने।
इसी दरवाज़े से
कभी मैं झाँक लेती हूँ बाहर
और कभी बदलते मौसम
घर के भीतर झाँक जाते हैं।
मखमली बादल
धुंध की चादर ओढ़ कर
चुपके से मुझे छू जाते हैं
बदलते मौसम का
अहसास दिला जाते हैं।
बारिश की मोटी-मोटी बूँदों को
मैं हथेली में जमा कर लेती हूँ
बाहर गीली छतरी और चप्पल
उतार लेती हूँ,मन के भीतर तक
मैं यों ही भीग जाती हूँ।
सुख और दुख का
आना जाना भी यहीं से है।
कल यहीं से तो गुज़रा था
और आज !
आज यहीं रुका है अभी
कुछ और पल रुकेगा
और कल यहीं से भीतर आएगा।
साल भी यहीं से गुज़रेगा
नया साल आएगा
एक दूसरे से गलबाँही करेंगे वे
इस खुले द्वार के बाहर
ड्योढ़ी पर
एक का स्वागत होगा
दूसरे से अलविदा कहेंगे।
कलंडर नया होगा
तारीखें,दिन, सप्ताह
सब वही होंगे
बस अंक बदलेगा
सोलह का सत्रह होगा।
मैं द्वार खोले रखूँगी
तुम सबकी प्रतीक्षा में
जो भूले से आ जाओ
साल मुबारक कहूँगी
फिर वही आना- जाना होगा
यह साल भी ख़ुशग़ुबार होगा।

ऋता सिंह

1st Jan 2017

तमन्नाएँ

तमन्नाएँ बड़ी ख़ुशक़िस्मत होती हैं

न कभी किसी के बंधन में होती हैं

न किसी की क़ैद में रहती हैं

वे बेख़ौफ़ सारी दुनिया में घूम आती हैं

वे तो बस अपनी मर्ज़ी की ही सुनती हैं

तमन्नाएँ बड़ी ख़ुशक़िस्मत होती हैं !

खुली आँखों से जिसे हम देख नहीं पाते

ये उन्हें जी भरकर देख आती हैं,

जिस रिश्ते के लिए हम ज़िंदगी भर तरसते हैं

ये उनसे खुले आम गलबाँही कर आती हैं

ये तमन्नाएँ बड़ी ख़ुशक़िस्मत होती हैं ।

कभी कहीं बर्फ़ीली सर्द वादियों में

न जाने किस छूटे पल से मुलाक़ात कर आती हैं

और न जाने रेत की तपिश में

अतीत के किस पल को ढूँढ़ने निकल जाती हैं।

समंदर के गहरे पानी में न जाने कौन सी आनंद लेती है

पर्वतों की ऊँचाई पर चढ़कर न जाने किसे पुकार आती है।

ये तमन्नाएँ बड़ी ख़ुशक़िस्मत होती हैं ।

बस में रखना चाहे भी कोई

कहाँ किसी के बस में वह रहती है

ख़याल और ख़्वाब साथी हों इसके

बस ये मन करते ही दिलो – दिमाग़ को छोड़

न जाने कहाँ भटककर आती हैं।

तमन्नाएँ बड़ी ख़ुशक़िस्मत होती हैं ।

जिंदगी हर पल जहाँ एक जंग सी लगती है

और रोज़मर्रा कई ग़म आ घेरते हैं

अभी हम ज़द् दोजहन में होते हैं

और ये तमन्नाएँ न जाने कहाँ सैर कर आती हैं

पल में चुपके से कुछ हसीन ख़ुशियों के पल ले आती हैं

हम रोना भी चाहें तो ये हँसा जाती हैं

तमन्नाएँ बड़ी ख़ुशक़िस्मत होती हैं ।

ये आज़ादख़याल होती हैं

हर जर्रे में बस जाती हैं

जहाँ हवा भी न पहुँच सके

ये वहाँ की ख़बर ले आती हैं

तमन्नाएँ बड़ी ख़ुशक़िस्मत होती हैं ।

पर एक बड़ी सच्चाई यह भी है

कि जिन पर ख़ुदा मेहरबान होता है

बस तमन्नाएँ उन्हीं के दिल में बसती हैं।

ऋता सिंह

20.10.2016